Tuesday, 22 November 2011

आरजू

आरजू 

जिंदगी में आरजू का साथ छोड़ न देना
गर मिले तो साथ किसी से साथ तोड़ न लेना
चाहो तुम इस जिंदगी में  कुछ भी हासिल करो
मगर किसी का साथ छोड़ मत देना 

Monday, 21 November 2011

अनमोल संग्रह

अनमोल संग्रह

तुझमे एक बात है
जो मेरे लिए खास है
अपनी दुआओं में शामिल करती है तू
तुझे पाने की यही सबसे बड़ी आस है

जब जब उदास होता हूँ
तेरे बारे में सोचता हूँ
तेरे बारे में सोचकर जब उदास होता हूँ तब
ख्याल आता है
कि
संभल जा कहीं
समुन्द्र की लहरों की तरह वजूद ही न रहे

सर्दी की उस रात  में
अकेला खड़ा था
यही सोचकर कि
मेरी किस्मत मुझे मिल जाये  तभी याद आया 
गर किस्मत ऐसे मिलती तो
दिन भी मेरे लिए रात होती
अनजाने रिश्तों से अच्छा है
उन यादों के साथ रहे
जो हमे कभी गम तो कभी ख़ुशी देते है

तेरी चाहत से बड़कर कुछ नहीं
तुझे दिए हुए वादों से ज्यादा कुछ नहीं
बस इतना तो बता
तेरी नफरत से कुछ ज्यादा है क्या

Tuesday, 15 November 2011

अनमोल संग्रह

शीशे को देखकर शर्मा सी जाती वो 
खुली हुई जुल्फों को संभालती
बदन पर बारिश की बूंदे
अक्सर उसकी याद दिलाती है
न जाने क्यों
आज भी याद आती है वो

न जाने क्यों
तेरा चेहरा
दीये की तरह बुझ गया
तू तो बच गई
मगर
हम आज भी
 दीये के लौं में
जल रहे है

हैरान था तेरे फैसले से
अपनी तक़दीर मानकर कबूल कर लिया
खुदा की रहमतों का ही असर है
कि
आज भी तुझे याद करता हूँ

विशवास है परवर दीगार पर वक़्त बदल देगा मेरा
आज जो जुदा है मुझसे
कल उसे मिला देगा

तेरे बारे में सोच कर हमेशा उदास रहता हूँ
मुझ बदनसीब को तो ये भी नहीं पता
कि , क्या तू भी याद करती है

मैं भी एक नशा हूँ
तू भी एक नशा है
आओं चले खिन दूर
क्योंकि जिंदगी भी एक नशा है
शुक्रिया
आपका रवि
आगे भी ऐसी ही रचना लिखता रहूँगा

उम्र

तेरी ढलती उम्र से डर नहीं
मुझे तो डर तेरी जवानी से है
जब उम्र जवां हो तो
मेरे दोस्त
मोहब्बत भी फीकी पड़ जाती है 

Monday, 14 November 2011

पीटर रोबक का निधन

पीटर रोबक का निधन
पीटर रोबट के निधन से न सिर्फ क्रिकेट जगत को भरी नुकसान हुआ बल्कि खेल जगत को भी नुकसान  हुआ है. मैंने उनके ज्यादा लेख तो नहीं पड़े लेकिन अक्सर उनकी चर्चाएं जरुर सुनता था .खुद सचिन ने भी उनके निधन पर खेद जताया.  उनकी मौत एक अनकहीं पहली न बन जाये इसलिए इस बात की तहकीकात करनी होगीं ये एक पूरे क्रिकेट जगत के लिए  भारी हानि है.
रवि

Friday, 9 September 2011

मेरी इच्छा

             मुझे क्रिकेट के डाटा को कलेक्ट करने का बहुत शौक है! कभी कभी मुझे लगता है  कि मैं क्रिकेट पर अच्छा लिख सकता हूँ और मेरा सपना है कि मैं क्रिकेट का एक बड़ा पत्रकार बनू !

Wednesday, 7 September 2011

झरोका कविता संख्या 129

मैं, जैसे ही सुबह उठा,
तो देखा की
दरवाजे के झरोके से       
मुझे कोई देख रहा है
अगल बगल में किसी की मौजूदगी से
स्वत ही नजरिया बदल गया
खिली धूप और उपर से
ठंडी ठंडी हवा दरवाजे के झरोके से
चीख चीख कर पूछ रही थी
तू कौन है
जो अनायास ही मुझ जैसे फकीर को प्यार की         
 भीख दे रही है
वो खुद से बेखबर है
बस,
यादों में उसके मैं ही हूँ,
उसके इशारों से,
अपने छत पर घुमने का खौफ सताने लगा
वो भी मजबूर है
मैं भी मजबूर हूँ
शायद
यही हमारी मजबूरी है
देखने की लालसा तो मेरी भी है
लेकिन, क्या करू जब उसकी याद आती है
तो दरवाजे के उस झरोके को देख लेता हूँ.