Tuesday, 15 November 2011

अनमोल संग्रह

शीशे को देखकर शर्मा सी जाती वो 
खुली हुई जुल्फों को संभालती
बदन पर बारिश की बूंदे
अक्सर उसकी याद दिलाती है
न जाने क्यों
आज भी याद आती है वो

न जाने क्यों
तेरा चेहरा
दीये की तरह बुझ गया
तू तो बच गई
मगर
हम आज भी
 दीये के लौं में
जल रहे है

हैरान था तेरे फैसले से
अपनी तक़दीर मानकर कबूल कर लिया
खुदा की रहमतों का ही असर है
कि
आज भी तुझे याद करता हूँ

विशवास है परवर दीगार पर वक़्त बदल देगा मेरा
आज जो जुदा है मुझसे
कल उसे मिला देगा

तेरे बारे में सोच कर हमेशा उदास रहता हूँ
मुझ बदनसीब को तो ये भी नहीं पता
कि , क्या तू भी याद करती है

मैं भी एक नशा हूँ
तू भी एक नशा है
आओं चले खिन दूर
क्योंकि जिंदगी भी एक नशा है
शुक्रिया
आपका रवि
आगे भी ऐसी ही रचना लिखता रहूँगा

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