Thursday, 11 July 2013



शिखा और मुन्ना



कढ़ाई में तेल डालते ही तेल का रंग कुछ बदल सा जाता हैं. दो बड़े- बड़े कमरों के बीच में रसोई थोड़ी उदास सी लग रही थी।  मिर्च. हल्दी नमक.गरम मसाला और कूटा हुआ लहसन अदरक अपनी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। रसोई की खिड़की के पास मकड़ी अपना जाल बुनने में मशगूल थी. शिखा सब्जी की चिंता छोड़ मकड़ी की मनोहर चित्रकारी को देख रही थी।  बाहर आंगन  में कुछ बच्चों के खेलने कूदने की आवाजें आ रही थी।  फर्श के एक कोने में रखा पोछा इस अंदाज में पड़ा हुआ था कि घर के लोगों को उससे कोई संबंध ना हो। शिखा बहुत व्यस्त नजर आ रही थी.

थोड़ी धूप खिली हुई थी.... शिखा थोड़ा काम निपटाने के बाद आराम करने की सोच ही रही थी कि इतने में आवाज आई कमबख्त.कहां चली गई ओ हो मारे दर्द के सिर फटने को हो रहा हैं..... आई मां जी शिखा तेज आवाज लगाकर दौड़ती हुई आई.. और अपनी सास को लेटाकर खाट के बराबर में उनका सिर दबाने लगी..... खाने में क्या बनाया हैं आज. शिखा की सास गले को रूघंते हुए बोली .... दाल और रोटी अपने घूंघट को ठीक करते हुए शिखा बोली.. कम से कम आज जो खीर बना लेती. क्यों सुरेश पैसे देकर नहीं गया क्या शिखा कुछ नहीं बोली जैसे कोई सांप सूंघ गया हो.. शिखा की सास एक करवट बदलकर आराम फरमाने में मशगूल हो गई.. शिखा उठी और गंदे कपड़ों को इकट्ठा करके ऊपर छत की ओर चली दी.... आज हवा में नमी थी इसलिए शिखा के हाथों में पसीने का अंश दिख रहा था... मन रह रह कर ना जाने किस  बात पर चिंतित था.।  पास में रखी थपकी, कपड़े धोने का, साबुन मग और बाल्टी में रखा गंदे हो चुके पानी वाला सर्फ इसी के इर्द-गिर्द शिखा अपने शब्दों को एक नई दिशा देने की कोशिश कर रही थी....... थपकी को जोर- जोर से मारने से छत पर गढ्ढे के निशान बन गए.... कपड़ों का पानी निचोड़ने के बाद शिखा एक-एक फटकारकर उन कपड़ों को सुखा रही थी.. मुन्ने के छोटे-छोटे कपड़ों को क्लिप के सहारे रस्सी से लटका दिया..हवा के सहारे कपड़े अपनी मनमौजी अंदाज में झूल रहे थे उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों वो सावन आने का इस्तकबाल कर रहे हो.......

शिखा ने जैसे ही अंगड़ाई को तोड़ा मानों उसका रोम रोम खिल उठा और सूखे हुए होठों पर एक फीकी हंसी सी आ गई..... कपड़े धोने के कारण हाथों की रेखाएं कुछ शर्मा सी गई थी..शिखा की छत के सामने कोई गंवार टाइप का लड़का आता हैं और उस पर अपना हक जमाने के लिए बेकार सी आवाज में गाना गा कर उसकी ओर घूरता हैं.. लेकिन वो उसकी तरफ बिल्कुल भी नहीं देखती और सीढ़ी से उतर कर नीचे की ओर चली जाती हैं. अपने जूड़े को ठीक करते हुए जैसे ही सोने के लिए तकिए को अपनी ओर खीचंती हैं कि जोर जोर से रोने की आवाजें आने लगती हैं. मुन्ना उठ गया हैं शिखा अपनी साड़ी को ठीक करते  मुन्ने की ओर करवट बदलती हैं मुन्ने को अपने सीने से लगाकर अपना दुध पिलाने लगती हैं..  .. कुछ ही देर बाद मुन्ने ने फिर से आंखे बंद कर ली जिससे कि उसकी मां आराम कर सके..... शिखा अब अपनी नींद को एक किसी सरकारी काम की तरह ठंडे बस्ते में डाल कर  काम में लग जाती हैं..  सूरज डूबने की ओर था.. शिखा की सास दोपहर की थकान को भूलकर होने वाली शाम को नमन करते हुए भैंस के चारे का इंतजाम करने के लिए तैयार हो रही थी............. भैंस आराम से अपनी पूंछ को उठाते हुए गोबर को साफ करने में लग हुई थी... इस बीच वो बराबूर जुगाली कर रही थी... झाडूं, सिल बाट के बिल्कुल नजदीक पड़ी हुआ थी.। शिखा ओ शिखा कहां मर गई... देख तेरा लल्ला उठ गया, मैं, आटा पिसवाने जा रही हूं.. बर्तन पड़े हुए हैं अच्छी तरह मांज दियो  शिखा की सास दरवाजे को भिड़काते हुए बोली...शिखा सब काम छोड़ते हुए मुन्ने को संभालने लगी.।  घड़ी ने ना जाने कब 6 बजा दिए मालूम ही नहीं पड़ा... मुन्ना आराम से दूध की बोतल के साथ सो गया। . पंखा अपनी तेजी के मताबिक नहीं चल रहा था।  हां, इतना था कि मक्खी उसके आस-पास भी नहीं थी.। 
शाम अपनी अंगड़ाईयों के साथ सोने को तैयार थी ..... मानो रात का स्वागत करने को तैयार हो खाट के सिराहने मुन्ना बिना कपड़े पहने खाली कटोरी के साथ खेल रहा था... शिखा कपड़ों को रस्सी से उतारकर खाट पर कुछ इस अंदाज में रख थी जैसे इनसे कोई वास्ता न हो........... क्लिप के सहारे लगे कुछ कपड़े अभी भी धीरे से चल रही हवा के झोके के साथ मुस्कराने पर आमदा थे... रात अपने पैर पसार चुका था.. घर के बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था....  शिखा की सास हुक्के को इस उम्मीद में सुलगा रही थी कि जैसे तैसे एक दो कश लगा सके... मुन्ना अचानक रोने लगा.. शिखा चूल्हे की राख को चिमटे के सहारे थोड़ा अंदर करके दौड़ी हुई आई,..... ना जाने क्या हो गया इसे सुबह से रोए जा रहा हैं.... इसका बाप भी अभी तक नहीं आया हुक्के के धुएं को आंगन में छोड़ती हुई शिखा की सास बोली. शिखा ने दूध की बोतल को मुन्ने के मुंह पर लगा दिया कितनी बार बोला हैं इस कलमुंही को कि अपना दूध पिला लेकिन मेरी कौन सुनता हैं आ गए हैं शहर से दो चार क्लास पढ़कर मुंह को बनाते हुए शिखा की सास बोली.. मां जी, मुझे थोड़ी कमजोरी महसूस हो रही हैं इसलिए मुन्ने को अपना दूध नहीं पिला सकती.. जबान तो देखो कैसे लबालब चलती हैं. चल घर में जा और मेरे लिए थोड़ा दूध गरम कर ला जी मां जी, अपने घूंघट को ठीक करते हुए शिखा बोली.  ऐसे लगा जैसे आज के जमाने में हिटलर आ गया हो..... शिखा की सास एक हल्की सी चादर को समटने लगी...आंगन के बाहर कोई उपले जला रहा था... सामने  वाले घर में लालटेन अपनी जिंदगी की अंतिम सांसे चल रही थी... शिखा की सास पंखे से हवा कर रही थी जो इस सिर्फ नाम की ही थी.. ..... जमीन पर खाट के पास रखा पानी का गिलास और साथ में रखी दवाई गुमसुम सी थी...... शिखा अभी अभी बर्तन साफ करके उठी थी.. घास काटने की मशीन के ऊपर रखी डिबिया मानों रात की खामोशी को समेटने की तैयारी में थी...मुन्ने को अपने वक्ष पर लिटाकर दिन भर की थकान को बिस्तर पर ओढने वाली ही थी कि .. कि दरवाजे पर आहट होती हैं.... खट खट शिखा मुन्ने को तकिए के सहारे लगा कर दरवाजे की ओर भागती हैं कुंडी को खोलते ही एक तेज आवाज आती हैं अब तक कहां थी साली तेरी मां की ...........  वो वो मैं . मुन्ने को सुला रही थी थोड़ा हकलाते हुए बोली ..  मुन्ने को सुला रही थी या अपने आशिक से बात कर रही थी... सुरेश लड़खड़ाते लड़खड़ते बोला आपने शराब पी हैं, क्या तू कौन होती हैं पूछने वाली  चल जा मेरे लिए कुछ खाने को ला बहुत भूख लगी हैं........ जी लाई ... खाना देखने  ही राजीव बोला अबे ये क्य़ा बनाया हैं जा जाकर अपनी मां को खिला ये दाल..... जी जी वो आपने पैसे नहीं दिए थे... तो घर में कुछ था नहीं तो मैंने दाल बना ली...... साली जुबान लड़ाती हैं.......... एक थप्पड़ शिखा के नाजुक गालों पर पड़ता हैं और आने वाले आंसू साड़ी के पल्लू में कही खो से जाते हैं...औऱ सासें कुछ धीमी पड़ जाती हैं............. सुरेश दारू पीकर सो जाता हैं। कुत्ते लगातार भौंक रहे हैं, डिबिया की लौ अब बुझ गई हैं। शिखा रोटी का एक टुकड़ा  खाने की कोशिश करती हैं लेकिन अपनी किस्मत के बारे में सोच कर ठहर जाती हैं., उधर मुन्ना उठ जाता हैं खाने को नहीं होने पर उसे उठाकर अपना दूध पिलाने लगती हैं। शिखा एक हाथ से पंखा और एक हाथ से मुन्ने को प्यार से थपकी देती रही.। इस दरम्यान ना जाने कब सुबह हो जाती हैं शिखा को मालूम नहीं होता.. और शिखा आधा घूघंट करके भैंसों की सानी करने लग जाती हैं. शिखा की सास हुक्के के सहारे कश लगा रही हैं।  शिखा का पति बड़े ही बेढंगे तरीके से सो रहा हैं....... मुंह पर लगातर मक्खी लग रही हैं... बाल ऐसे कि मानों सालों से ना नहाया हो बीड़ी पी पीकर अपने होंठ भी काले कर दिए। शिखा अपनी किताबें हिफाजत से रख रही हैं। शिखा का कल बीए का इम्तिहान हैं..

रवि कुमार छवि
भारतीय जनसंचार संस्थान
(नई दिल्ली पूर्व छात्र ) 

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