Tuesday, 25 June 2013



थूक का स्वाद 
आइए शर्मा जीकैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैंऔर ये बेवजहअपना गमछा क्यों ओढ़ के रखे हैं वो भी इतनी गर्मी में. थोड़े उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती हैं... और आलती पालथी मारकर बड़े इत्मीनान से बैठ जाते हैं. .बगल में पसीना आकर कुछ देर रूक सा सा जाता हैं . गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता हैं  जो कुछ समय बाद मुरारी बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं।  दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। छोटे बच्चे अपनी उम्र से पहले परिपक्कव होने की कोशिश करते दिखते हैं...... शर्मा जी एक खास किस्म का पान लेकर चल देते हैं ... जो किसी पुड़िया मे बंधी हुई थी। और उसे अपनी पेंट के  बाएं जेब में रखते हैं।   
शर्मा जी एक हाथ से छाता पकड़ें हुए 1990 के दशक के पुराने चश्मे को ठीक करते हुए आगे बढ़ जाते हैं   कुछ दूरी पर शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगते हैं. मानों जुगाली कर रहे हो। और देखते ही देखते अपने दफ्तर की ओर निकल जाते हैं। जितनी रफ्तार सड़क पर चल रही गाड़ियों की होती हैं उतनी ही धीमी गति से शर्मा जी पान के स्वाद लेते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता तब तक वो थूकते नहीं।
शर्मा जी उस पान को ऐसे खा रहे थे मानों कि वो पान इस दुनिया का आखिरी पान हो...... लगाता था कि शर्मा जी पान के माध्यम से अपने पैसे वसूल रहे थे। सिर्फ शार्मा जी ही नहीं अमूमन,पान खाने वाले लोगों की स्थिति कुछ ऐसे ही हैं........ कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं... पर क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। .. ना जाने क्यों शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं समझते । हमारे देश में कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे......  
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा खा रहा था.....  गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए। मुझे समझ नहीं आया कि वो महाशय आखिर क्यों उसे बड़े चाव से चबा रहे हैं खैर, इनमे से कुछ ऐसे लोग भी होते हैं . जो पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो........... कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की हैं शायद तभी वो लोग इस काम में इतने माहिर हैं....... और इतनी बेफ्रिकी से  कर रहे होते हैं ...... मगर एक बात तो हैं पान हो या गुटखा इनके थूक के स्वाद में शायद एक अजीब सा स्वाद हैं जो लोगों के मुंह को सान देता हैं.......
सोचता हूं कि क्यों न एक बार इसके स्वाद चखा जाए आखिर हम भी तो देखे कि इनके थूक का स्वाद कैसा होता हैं।


रवि कुमार छवि  

Saturday, 22 June 2013

कूड़ा घर  
जून की एक भरी दोपहर की गर्मी में वो कई सालों बाद साफ हो रहे नाले के पास इस इंतजार में  खड़ा हुआ था. कि नाले से कुछ सिक्के मिल जाए जिससे आज घर में चूल्हा जल सके।  तेज़ चल रहे ट्रैफिक से उसका कोई नाता नहीं था। वो तो बस किसी बड़ी क्रेन से उठकर और गिर रहे उन कूड़ें के ढेरों को देख रहा था.. बनियान और अपने पैरों के साइज से छोटी चप्पल फुल पेंट को काटकर बनाई गई हाफ पेंट पहने हुए राजू के हाथों में बड़ा सा कट्टा और बड़े से डंडे के नीचे लगी हुई छोटी सी चुंबक. वाली लकड़ी थी......... आखों में एक बनावटी सी हंसी मानों जिंदगी में कोई गम नहीं हैं......... सूरज की पड़ती चमक ने उसके बचपन की आजादी छीन ली हो. राजू के घर की माली हालत ने मानों उसके स्कूल जाने की इच्छाओं की निर्मम हत्या कर दी थी....... 
मैं रोज अक्सर आफिस जाते वक्त दोपहर को राजू को किसी नाले या किसी कूड़ें के ढेर के पास देखता था............. उससे देखकर लगता था कि वो किसी अजीब सी उधेड़बुन में लगा हुआ हैं.............  चेहरे पर लग  आ रही मक्खियों से बेपरवाह राजू खुद में कोई किरदार रचता रहता.......  कई बार सोचा कि उससे बातें करूं लेकिन समय मुझे इसकी इजाजत नहीं देता था।
लेकिन आज रविवार हैं तो सोचा कि राजू से मिला जाए. अपनी किताबें कम्प्यूटर के बराबर में रख कर मोबाइल को चार्जर से हटाकर घर से निकल जाता हूं इस उम्मीद में कि आज राजू से मुलाकात हो जाए .......... दरवाजे की कुंड़ी लगाकर जैसे ही मैंने अपनी गली में झाकं कर देखा.. तो सन्नाटा सा पसरा हुआ था..... एक अजीब तरह की उदासी सी छाई हुई थी........... खूंटे में बंधी हुई बकरी चिल्लाकर किसी को मदद के लिए पुकार रही थी. राजू के घर का ताला लगा हुआ था. मेरी उत्सुकता अब और भी बढ़ गई थी. कि इतनी सुबह  आखिर कहां गया..... मैं उसे ढूंढने के लिए निकल पड़ा।  गली के चौराहे पर खड़े हुए लड़कों के पास से मैं तेजी से निकल गया। ना जाने कहां चला गया ये लड़का अपने मोबाइल में टाइम देखते हुए मैंने अपने मन में सोचा। आखिर  मुझे एक सड़क के उस पार मिला। वो रोज़ की तरह एक कूड़े के ढेर के पास खड़ा हुआ था............ उन्हें देखकर राजू मन ही मन खुश हो रहा था...............  मैंने जैसे ही उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कुछ पूछा.. राजू ने अपनी गर्दन मेरी ओर धीरे से मोड़ी.  मैंने उससे पूछा कि क्या कर रहे हो तो इस पर राजू ने कहा देखता  हूं कि आज कितने पैसे मिलते हैं या क्या कोई कीमती चीज मिलती हैं, राजू ने अपने पसीने को गंदे हाथों से पोछते हुए कहा.. मैंने कहा क्यों,  पढ़ाई नहीं करनी क्या...... सर पढ़ाई तो करनी हैं थोड़ा हकलाते हुए राजू  बोला......  इतना कहकर राजू की आंखों में आंसू आ गए...... और निगाहें सामने ताले लगे स्कूल की ओर इशारा करने लगी....  मैंने उससे  पूछा कि क्या तुम भी स्कूल जाना चाहते हो...... जवाब में उसने हां में सिर हिलाया..... अब मेरी जिज्ञासा  और बढ़ गई थी..  इसलिए नहीं कि वो स्कूल जाना चाहता हैं बल्कि इसलिए कि  स्कूल जाने की बात कहते समय उसकी आंखों में एक आत्मविश्वास था. एक चमक थी.... ....... जो रह-रह-कर उसके आने वाले सुनहरे भविष्य की ओर इशारा कर रही थी...........  चूंकि मैं, इस शहर के मोबब्बत से अभी कोसों दूर था ......... तो मैंने राजू को ही किसी ऐसे स्थान पर चलने को कहां जहां राजू की गरीबी तो हो लेकिन उसका उपहास उड़ाने वाला कोई ना हो........
और फिर हम दोनों चल दिए एक ऐसी मंजिल की ओर जो राजू को इस दुनिया में उसको एक मुक्कमल पहचान दिला सके। नाले के पास पड़े हुए कूड़े को अब किसी और राजू की तलाश थी.......... अचानक जोर की बारिश शुरू होने लगी....................

 रवि कुमार छवि 

Saturday, 27 April 2013

थूक का स्वाद




थूक का स्वाद

आइए शर्मा जी, कैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैं, और ये बेवजह, अपना गमछा क्यों ओढ़ के रखे हो। वो भी इतनी गर्मी में।  थोड़े उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती हैं...गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता हैं  जो कुछ समय बाद मुरारी बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं। दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। शर्मा जी एक खास किस्म का पान लेकर चल देते हैं ... जो  किसी पुड़िया मे बंधी हुई थी। उस पान की पुड़िया को अपनी पेंट के  बाएं जेब में रखते हैं   
शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगे मानों जुगाली कर रहे हो। और देखते ही देखते  अपने दफ्तर की ओर निकल जाते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता तब तक वो थूकते नहीं। कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं... पर क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। सिर्फ शर्मा जी ही नहीं वे जो लोग गुटखा. मसाला आदि खाते हैं....... उनकी हालत कमोबश ऐसी ही हैं. ....... ना जाने क्यों शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं समझते ।  
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा खा रहा था.....  गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए।  तो दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं.. जो कुछ पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो........... कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की हैं....... खैर, पान हो या गुटखा इनमें कुछ तो हैं इनके थूक के स्वाद में जो इन्हें बाहर नहीं फेंकने देता
सोचता हूं कि क्यों न एक बार खा कर देखा जाए आखिर हम भी तो देखे कि इनके थूक का  स्वाद कैसा होता हैं।

Wednesday, 28 March 2012

छोटे प्रारुप में चमकना छाएगाः भारत

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच होने वाला एकमात्र ट्वंटी  मैच 30 मार्च को जोहांनसबर्ग में खेला जाएगा। यह मैच भारतीयों के दक्षिण अफ्रीका में बसने के 150 वर्ष पूरे होने पर खेला जाएगा। इस मैच के लिए रोबिन उथप्पा को सचिन तेंदुलकर की जगह शामिल किया गया है जो पहले ही ट्वंटी मैच से सन्ंयास ले चुके हैं।
एकमात्र ट्वेंटी-20 मैच के लिए दक्षिण अफ्रीकी टीम की कमान जोहन बोथा संभालेंगे । जबकि न्यूजीलैंड के खिलाफ रिकार्ड छक्के जड़ने वाले रिचर्ड लेवी को भी  टीम में शामिल किया गया है। भारत का मेजबानों के खिलाफ रिकार्ड अच्छा रहा है।
 भारत ने अपना पहलाट्वंटी मैच अफ्रीकी टीम के खिलाफ खेला था जिसे भारत ने जीता था उस मैच में दिनेश कार्तिक को शानदार प्रदर्शन के लिए मैन आफ द मैच चुना गया था। इसके बाद 2009 में सुरेश रैना के शतक से भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हरा दिया था। ओर भारत हमेशा की तरह अपनी स्पिन गेंदबाजी  के भरोसे ही रहेगा। पिछले रिकार्ड को देखते हुए निश्चित रुप से भारत का पलड़ा ही भारी रहेगा। हालांकि मेहमानों को अपने घर में खेलने का फायदा मिलेगा। 

Monday, 26 March 2012

दमदार बांग्लादेश

भले ही बाग्ंलादेश एशिया कप का फाइनल मैच नहीं जीत पाई हो लेकिन उन्होंने  अपने शानदार खेल से न सिर्फ घरेलू क्रिकेट प्रेमियों  का बल्कि विश्व क्रिकेट प्रेमियों का दिल भी जीत लिया।
एशिया कप के शुरु होने से पहले बांग्लादेश को खिताब की दावेदारों  में भी शुमार नहीं किया जा रहा था। लेकिन उन्होंने अपनी जीवटता का बखूबी परिचय देते हुए पहले विश्व चैंपियन भारत और फिर चार बार की एशिया कप विजेता श्रीलंका को बाहर का रास्ता दिखाया। निश्चित रुप से ये जीत बाग्ंलादेश के क्रिकेट भविष्य के लिए संजीवनी काम करेगी।
भारत  पर मिली जीत को क्रिकेट पंडित महज एक तुक्का मान रहे थे लेकिन  उन्होंने जिस तरह से अगले मैच में श्रीलंका को हराया उसे देखकर कहीं से भी नहीं लगा कि वो एक नौसखिया टीम है। शुरुआत में ही बांग्लादेश ने पाकिस्तान को टक्कर देकर ये दिखा दिया कि इस टूर्नामेंट  में   उन्हें कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल होगी।
बहरहाल, पाकिस्तान ने अपना दूसरा एशिया कप  में  जीतकर दिखाया कि वो वाकई, में किसी भी दिन सर्वश्रेष्ठ होने पर अपने से भी ज्यादा मजबूत टीम को हराने की क्षमता रखते हैं। कहना गलत न होगा कि इस जीत से पाकिस्तान में क्रिकेट को बहाल करने  में  आसानी मिलेगी।
रवि
नई दिल्ली
8802076525

Friday, 23 March 2012

अशिष्टता के दरवाजे

अशिष्टता के दरवाजेराजधानी की सड़कों पर विभिन्न प्रकार के वाहन सरपट दौड़े देंखे जा सकते हैं जो  लोगों  को उनके उद्गम स्थान से गंतव्य स्थान तक पहुचाते हैं। मगर इन वाहनों  में डीटीसी की बस सेवा अपनी एक विशेष भूमिका निभाती है। यात्रा करने का काफी शौक है, खासकर बसों  में यात्राएं करना पड़े तो सोने पे सुहागा होता है। डीटीसी की बसों में यात्रा करने वालों  में सबसे अधिक संख्या मध्यवर्गीय परिवारों  की होती है।
अभी कुछ दिनों  पहले मुझे देश के सबसे बड़े बस अड्डे  कश्मीरी गेट से साकेत की बस लेनी थी। बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद साकेत जाने वाली बस मेरे चंद क़दमों  की दूरी पर आ रुकी थी। जैसे-तैसे भीड़ के भंवर से निकलकर काफी मशक्कत के बाद उस सीट पर जा बैठा जहां बैठने के लिए अन्य लोग धक्का -मुक्की पर आमदा थे। सीट मिलने से खुशी साफ तौर देखी जा सकती थी। अगर सीट नहीं मिलती तो पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ती। जिससे मेरी कपड़ों  की इस्त्री के खराब होने का डर था।
बस तेज गति से आगे बढ़ रही थीं और मैं दिल्ली की हरियाली का लुफ्त उठा रहा था इतने में पीछे से आवाज आई एक्सक्यूज मी एक टिकट देना ज्यों  हीं मैंने अपनी नजरें दौड़ाई तो पाया एक महिला कंडक्टर की सीट पर बैठी है। उसके हाथ में 5,10,20,50,100 के नोट देखकर सहज अनुमान लगा लिया की इस बस में कंडक्टर एक महिला है। इसके लिए मुझे अपने मानस पटल पर दृष्टि को टटोलने की जरुरत नहीं पड़ी। महिला कंडक्टर को देखकर हैरानी भी हुई जिसका कारण यह था कि राजधानी की बसों में अधिकांशतः पुरुष ही कंडक्टर होते हैं लेकिन उस बस में  महिला कंडक्टर थी यह मेरे लिए भी दोहरी खुशी थी पहले तो यह है  एक तो पुरुष कंडक्टर की हेकड़ी से कुछ निजात मिली। और दूसरी यह है कि अब वाकई में लगता है कि देश में महिलाओं  ने पुरुषों   के वर्चस्व को चुनौती देना शुरु कर दिया है।
मैं, बस की खिड़की वाली सीट पर बैठा था जहाँ  हवा तो आ रही थी लेकिन थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। महिला कंडक्टर लगातार टिकट काट कर यात्रियों  को दे रही थी। हालांकि वो एक कम उम्र की महिला थी लेकिन उसके टिकट देने से लग रहा था कि मानों  वह कोई पेशेवर कंडक्टर हो। यह देखकर काफी अच्छा लग रहा था कि महिलांए जो कभी समाज में अपने जीवनयापन के लिए  पुरुषों  पर निर्भर रहती थी। आज खुद आत्मनिर्भर होकर  पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है है। यह कहीं न कहीं समाज में  महिलाओं के प्रति बदलती हुई मानसिकता को दर्शाता है। यह सब सेच ही रहा था कि अगले ही पल बस झटके से रुकी स्टैंड से दो-चार लड़को का समुह देखा जो दिखने में अच्छे घर के लिए लग रहे थे। मगर, उनके आचरण से लगा कि मानों  वो लोग तहजीब की पहली कक्षा में हो चूंकि कंडक्टर एक महिला थी इसलिए लड़कों  के समूह ने कंडक्टर पर अपरोक्ष रुप से अश्लीली फब्तियां कसनी शुरु कर दी। ये देखने के बाद भी अनजान बनने की कोशिश करने लगा। महिला कंडक्टर थोड़ी सहज होने की केाशिश तो करती लेकिन, असहज होने के भाव उसके चेहरे वर साफ तौर पर देंखे जा सकते थे।
बस के आगे बढ़ने से उसमें भीड़ भी लगातार बढ़ रही थी। खिड़की से बाहर आने वाली हवा इतने लोगों  को देखकर बाहर चली जाती। ये सिलसिला यूं ही चल रहा था। मेरे मन में विचार निंरतर जन्म ले रहे थे अगर इस महिला के स्थान पर कोई पुरुष कंडक्टर होता तो क्या वाकई में लड़कों का समूह अपने संस्कारों  को भूल कर अशिष्टता के दरवाजे को लांघता। बस, अभी भी त्रीव गति से चल रही थी।
मैं, यात्रा के अंत तक यही सोचता रहा कि अगर महिलाएं इसी तरह समाज में अपनी छाप छोड़े तो पुरुष की वर्चस्वता वाले समाज को नकारा जा सकता है। यदि कहा जाए कि पुरुषों  की सत्ता को महिलाओं ने चुनौती देनी शुरु कर दी तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी। मेरे जेहन ये विचार अग्रसर हो ही रहे थे कि बस अचानक रुकी। भीड़ को कम होते देख समझ गया कि बस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गई है। महिला कंडक्टर बस को डिपो तक ले जाने में  ड्राइवर की सहायता कर रही थी। मै, अपने दफ्तर की मुड़ चुका था।

रवि

नई दिल्ली

8802076525

Thursday, 22 March 2012

मेरा मोबाइल

मेरा मोबाइलघर से नाश्ता करके अपने कॉलेज  के लिए निकलता हूं तो निकलने से पहले अपनी जींस के जेब पर जरुर हाथ मारता हूं क्योंकि  उस जेब में हमेशा एक मोबाइल रखना पड़ता है।
मेरे मोबाइल का मॉडल  नंबर 2700 है। यह नोकिया का सेट है। मैसेज कार्ड का रिजार्ज करने पर इसके बटन मेरे दिमाग से तेज चलते हैं। नेट का रिचार्ज कराने पर मेरे दोस्तों की तरह मुझसे बातें करने लगाता है। इसकी मेमोरी कार्ड मुझे टीवी देखने से रोककर अपनी जीबी या केबी की फिल्म क्लिप दिखा देती है। ये मेरे साथ रहता है। लेकिन क्लास में जाने से पहले शांत अवस्था में करना पड़ता है। क्लास से निकलने के बाद हिंदी टाईपिंग करते-करते इसकी मेमोरी कार्ड में मौजूद कोई गाना मेरी जुबां से लग जाता है। अपनों से बातें कराते-कराते जब इसकी बैटरी डाउन होने लगती है तब इसकी मासूमियत पर तरस आ जाता है। खाना खाते वक्त जब दोस्त को मैसेज करके बताना पड़ता है कि कल क्लास नहीं  है तब पिताजी का थप्पड़ कुछ देर के लिए इसे मुझसे दूर कर देता है फिर भी इसके और मेरे संबंधों में तल्खी नहीं आती। रात को जब घरवाले सो जाते है तब इसकी लीड को कानों में डालकर इसकी मेमोरी कार्ड पर जो पैसा खर्च किया गया है उसे वसूलने की कोशिश करता हूं।