Sunday, 21 December 2014

 अनमोल संग्रह 

1) बरसने दो बूंदों को
बरसना उनका काम है
वो भीगा रही है उन्हें
जिसे वो अपना बनाना चाहती है.

2) बारिश में भीग गए कई ख़त
 मगर जवाब हमेशा सूखा ही मिला

3)आहिस्ता से रखो कांच जैसे नाज़ुक ख़्वाबों को
 कहीं ये टूट कर बिखर ना जाए.

4) तन्हाई की इन इमारतों में
उदासी के कमरे है कई
यहां सीढ़िया बेबस है तो
शहर बेजुबां सा है

5)इस तन्हा शहर में बेबसी की कई इमारतें है
जिससे भी पूछो पता वो नज़रे फेर लेती है.

6) अभी सोया हुआ था ये शहर
कि, तुम्हारी अहाटों ने उठा दिया

7) चाहत के रास्ते बताएंगे
 दिल का आशियाना कहां है.

8) मुझ पर इल्ज़ाम लगा
ख़ुद को बेदाग़ कर दिया

Saturday, 28 June 2014

 मैं, शायर नहीं

मैं, शायर नहीं
क्योंकि शायर तो लोगों के साथ रहकर भी
तन्हा रहता है
मैं, उसकी क़लम की स्याही की एक बूंद हूं,
जिसके निशां के धब्बे
जिंदगी के पन्नों पर है
ख़ूब सिखाया तेरे धोखे ने
फिर भी क़लम ख़ामोश रही मेरी
सड़क किनारे चलता रहा
किसी हादसे से बचकर
बेख़बर थी वो
मुझसे बिछड़ कर
मिली वो एक दिन
जैसे अनजान सी थी
फिर भी क़लम ख़ामोश रही मेरी
मेरी क़िताबे मेरा बैग सब महफूज़ थे
मगर बेबस था स्कूल मेरा
कभी जो पढ़ती थी बच्चियां वहां
आज घूर कर देखती है वो
किससे बयां करुं
उनकी मासूम आंखों की नज़रों को
फिर भी क़लम ख़ामोश रही मेरी
कई झूठ बोले
मगर, खुद से कभी सच ना कहा
शहर के साथ नाम भी बदलता रहा
सुबह के उजाले में
बीते अंधेरे के ग़मों को तलाशता रहा
फिर भी क़लम मेरी ख़मोश रहती
छत से तंग गलियों बड़ी बेसब्री से देखता
ख़ुशी से बादल रोते
साथ में रोते हम भी
इन पलों को संजो कर रखता कैसे
शब्दों को आकृति देता कैसे
फिर भी क़लम मेरी ख़मोश रहती
दौलत थी पर सहारा ना था
घर बड़ा बहुत था मगर, खाली था
समंदर नजदीक था
लहरे दूर थी.
किसे अपना राज़दार बनाता
जिंदगी में कहने के लिए बहुत कुछ था
एक डायरी ही थी
जिस पर कुछ लिखता
फिर भी क़लम मेरी ख़मोश रहती












Saturday, 24 May 2014

ना जाने क्यों


ना जाने क्यों आज-कल खोया-खोया सा रहता हूं,
खुद से खफा रहता हूं,
बिना हवा के चलने से पेड़ों को हिलते हुए देखता हूं,
बिन बारिश के बादलों में इंद्रधनुष को देखता हूं,
तो कभी, लहरों की बूंदों को गिनने की कोशिश करता हूं,
ना जाने क्यों आज-कल खोया-खोया सा रहता हूं,
कोई पूछ ले सवाल,
तो जवाब देने से डरता हूं,
हवा के रुख से बातें करता हूं,
कभी पतंग की डोर को,
धागे में पिरोता हूं,
ना जाने क्यों आज-कल खोया-खोया सा रहता हूं,
तमाम पहेलियां हैं चारों ओर,
फिर भी उन्हें सुलझाने से डरता हूं,
सुर-ताल की चिंता किए बिना,
संगीत को सुनता हूं,
अजनबियों के साथ दोस्ती करता हूं,
मगर, बातें करने से कतराता हूं,
बदलते वक्त के साथ तालमेल बिठाता हूं,
धूप में भी छांव की तलाश करता हूं,
ना जाने क्यों आज-कल खोया-खोया सा रहता हूं,,
पलके खामोश सी रहती है,
तो सांसें बैचेन,
दिल बेकरार सा रहता है,
तो उम्मीदें धुंधली लगती है,
जो मेरे पास है,
उसके बारे में सोच-सोच कर परेशां सा रहता हूं,
ना जाने क्यों आज-कल खोया-खोया सा रहता हूं

Saturday, 3 August 2013

तेरे लिए 

मै,तेरे लिए आया,
इस जिंदगी में,
चाहकर कर भी तेरा ना हो सका,
मुरझे हुए फूलों की तरह मेरी सवेंदनाएं भी मुरझा गई,
खिली हुई कलियों की खुशियों जैसे
प्यार का अहसास होने लगा था,
कुछ सपने थे,
जो पतझड़ की तरह हो गए,
बिन उसके एक पल भी एक नागवार लगने लगा
राहें बनाने से पहले ही
उन राहों पर चलना छोड़ दिया,
पास तो था,
मगर मीलों की दूरी तय करके
पास आने की कोशिश करता,
अतीत को भूलने की कोशिश में
आजसे नफरत करने लगा
बुझे हुए मन से
दिल में एक तीली जलाने लगा
उसके बगैर हर आसान रास्ता,
मुश्किलों में तब्दील हो जाता.
वक्त के बदलाव ने
मुझमें परिवर्तन ला दिया
आज वो मेरे साथ हैं,
जिसके लिए इस जिदंगी में आया था.


रवि कुमार छवि
भारतीय जनसंचार संस्थान


Tuesday, 30 July 2013

हवा की नाराजगी  

हैरान हू,
कि,
आज हवा भी मुझसे नाराज है,
पेरशान हूँ
कि,
जमीन मेरे भावनओं पर टिकी है,
बसंत के मौसम में,
मुरझाया हुआ सा हूँ,
कला साहित्य से प्रेम होने पर भी,
सिर्फ ,
चंद किताबों को टटोलता रहा,
सोचने के तरीकों में,
अनायास परिवर्तन आ गया,
रास्ते में खड़े होकर,
बार बार,
वक़्त की प्रतीक्षा करता,
बादलों की गर्जना से,
विचलित हो उठता,
इस भोर में,
रात की चुप्पी को तोड़ने की कोशिश करता,
सुबह की सादगी में,
दोपहर की हैवानियत को छिपाने की इच्छा करता,
बिन मतलब लोगों से बातें करने में,
संकोच करता,
लिखने की तम्मना तो है,
लेकिन,
टिप्पणी करना आदत नही रही,
पास होकर भी,
दूसरों से खुद को दूर पाता,
हाँ नाँ की,
फ़िराक में ,
हालत अधर में लटक गए,
मगर,
अगले ही पल,
फिर सोचता हूँ
आज हवा मुझसे नाराज क्यों है ,


रवि कुमार छवि

Saturday, 20 July 2013



शाहदरा से कश्मीरी गेट

शाहदरा मेट्रो स्टेशन आज थोड़ा उदास सा लग रहा था।  साधारण सुरक्षा चैकिंग से गुजरने के बाद आगे बढ़ा।
जहां से मेट्रो कार्ड को रिचार्ज कराया और अपने पर्स में रखते हुए भीड़ से बच गया। मेट्रो की निकासी मशीन थोड़ी खराब हालत में थी.. कुछ ही पलों में लोगों का जमावड़ा सा लग गया। पर्स को प्रवेश गेट से सटाकार अंदर दाखिल हुआ  ऊपर लगी घड़ी बता रही थी कि किस समय कौन सी ट्रेन हैं. खैर, जल्दी होने के कारण तेजी से मेट्रो की ओर दौड़ा। इस बीच अपने बैग को भी संभालाता हुआ भागा और जब लगा कि इस स्थिति से मेट्रो नहीं छूटेगी तब जाकर रुमाल को जेब से निकाला और आ रहे उस पसीने को पोछा जो आटो में बिल्कुल सिमट कर बैठी लड़की के स्पर्श से था। रूमाल में से उसकी देह की भीनी खुशबू महक रही थी। स्टेशन पर लगे बड़े बड़े बोर्ड किसी आने वाली फिल्म या किसी मोबाइल कंपनियो का बखान कर रहे थे.. कुछ लोग विज्ञापनों के शीशों को देखकर अपनी बालों को सवांर रहे थे। पहले कोच वाले स्थान पर नीचे फर्श पर लिखा था. केवल महिलाएं लेकिन वहां महिलाएं सिर्फ नाम मात्र को ही थी.. हर बार की तरह पुरूष वहां भी अपना हक जमाने के लिए तैयार थे। 
मेट्रो स्टेशन में पीली लाइन लोगों के जूतों से काली पड़ चुकी थी। हवा में कुछ नमी थी। मेट्रो का इंतजार करते करते लोगों के कपड़े पसीने से आर-पास की तैयारी में थे. एक ओर दिलशान गार्डन की मेट्रो लाइन में लोग चढ़ने को तैयार थे.. वहां कोई धक्का मुक्की नहीं थी। तो दूसरी ओर रिठाला लाइन की मेट्रो में लोगों की भीड़ जुटने लगी। स्टेशन के खुली जगह से शाहदरा की लोकल ट्रेन की आवाज अखबार पढ़ने से दूर कर रही थी.. पीले रंग में पुते हुए बोर्ड पर तीन भाषाओं में लिखा हुआ शाहदरा जंक्शन स्टेशन की अहमियत को बयां कर रहा था.. प्लेटफार्म पर खड़ी हुई लोकल ट्रेन रह रह कर अपने शहर कोलकाता की यादें ताजा करा रही थी..
वहीं सबसे आगे वाले कोच में खूबसूरत लड़कियों के दर्शन हो रहे थे तो कुछ अपने कम कपड़ों का प्रदर्शन कर रही थी। जिन्हें देखकर फिर से मन में सकुंचित यौवन इच्छाएं व्यापक होने लगी। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों लेक्मे फैशन वीक चल रहा हो।
बीच बीच में मेट्रो में होने वाली घोषणाएं यात्रियों को खुद से बोर होने से बचा रही थी। चार कोच वाली ट्रेन बेहद धीमी गति से यात्रियों के सामने आ खड़ी हुई थी मानों आज के जमाने की तकनीक का बखान कर रही थी. मैं, बिना किसी से धक्का मुक्की किए बिना मेट्रो के अंदर चढ़ गया.. सहसा एक झटके से मेट्रो अपने गंतव्य की ओर चल दी.। अपने देश में तो मेट्रो सबसे पहले कोलकाता में आई थी. जिसे आए हुए भी बमुश्किल 30 साल भी नहीं हुए थे... विदेशों मे तो मेट्रो को एक लंबा अरसा गुजर चुका था। जहां शानदार लोकेशन आपका इंतजार करती हैं। लेकिन दिल्ली की मेट्रो का अपना अंदाज हैं। इस बीच ना जाने कब ट्रेन शाहदरा से वेलकम आ गई पता हीं नहीं चला। वेलकम सुनते ही 2007 की सुपर हिट फिल्म वेलकम याद आ गई।   

वेलकम से ट्रेन अपने अगले पड़ाव की ओर चल दी उसका अगला स्टेशन था.. सीलमपुर जो दिल्ली में एक अनोखे अंदाज के लिए जाना जाता हैं.. मेट्रो की बाहर की लोकेशन में सुंदर पर्वत नदियों की बजाय ताश खेलते लोग, कूड़ा बीनते बच्चे , पटरी पर बैठा एक छोटा लड़का शौच करते हुए लोग और मेट्रो से रेस लगाती दिल्ली की लोकल ट्रेन इन्हें देख कर बस मन में एक सवाल आता हैं कि यहां विधया बालन का शौच वाला विज्ञापन कितना प्रासंगिक हैं..  और मेट्रो धीरे से सीलमपुर स्टेशन की ओर बढ़ती हैं.। इन सबके बीच बाएं हाथ की ओर खुला सीलमपुर मेट्रो का दरवाजा। यहां से कुछ लोग इस अंदाज में चढ़े कि देखते ही लग गया कि आखिर क्यों ये दिल्ली का खास इलाका माना जाता हैं....
अब अगला पड़ाव था शास्त्री पार्क यहां से मेट्रो की गाति थोड़ी तेज हो गई थी.। दिल्ली की यमुना को देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे ना जाने कितने लोग इसके अपमान के लिए जिम्मेदार हैं... लेकिन ये अभी भी चुप
हैं.. स्थिर हैं. और धैर्य से आगे की ओर चल रही हैं।  इस बीच कश्मीरी गेट पर उतरने वाले लोग अपनी –अपनी सीट से उतरने लग रहे थे.. कुछ उम्रदराज लोग अपने लिए बनाई गई सीट पर बैठने के लिए उतवाले दिख रहे थे... मेट्रो धीरे – धीरे यमुना को पार कर चुकी थी.. जैसे लगा कुछ छुट गया हैं... कुछ ही पलों में मेट्रो कश्मीरी गेट पर शाही अंदाज में रूकती हैं... लोग खुद ब खुद रास्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते बल्कि मेट्रो से बाहर निकलने वाले लोगों द्वारा धक्का देकर सामने से हटाया जाता हैं. सामने बड़े बोर्ड पर लिखा हुआ हैं कश्मीरी गेट।  दोपहर के करीब 2 बजकर 15 मिनट हुए थे ।  




 रवि कुमार छवि 

(पूर्व छात्र , भारतीय  जनसंचार संस्थान) 

Thursday, 11 July 2013



शिखा और मुन्ना



कढ़ाई में तेल डालते ही तेल का रंग कुछ बदल सा जाता हैं. दो बड़े- बड़े कमरों के बीच में रसोई थोड़ी उदास सी लग रही थी।  मिर्च. हल्दी नमक.गरम मसाला और कूटा हुआ लहसन अदरक अपनी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। रसोई की खिड़की के पास मकड़ी अपना जाल बुनने में मशगूल थी. शिखा सब्जी की चिंता छोड़ मकड़ी की मनोहर चित्रकारी को देख रही थी।  बाहर आंगन  में कुछ बच्चों के खेलने कूदने की आवाजें आ रही थी।  फर्श के एक कोने में रखा पोछा इस अंदाज में पड़ा हुआ था कि घर के लोगों को उससे कोई संबंध ना हो। शिखा बहुत व्यस्त नजर आ रही थी.

थोड़ी धूप खिली हुई थी.... शिखा थोड़ा काम निपटाने के बाद आराम करने की सोच ही रही थी कि इतने में आवाज आई कमबख्त.कहां चली गई ओ हो मारे दर्द के सिर फटने को हो रहा हैं..... आई मां जी शिखा तेज आवाज लगाकर दौड़ती हुई आई.. और अपनी सास को लेटाकर खाट के बराबर में उनका सिर दबाने लगी..... खाने में क्या बनाया हैं आज. शिखा की सास गले को रूघंते हुए बोली .... दाल और रोटी अपने घूंघट को ठीक करते हुए शिखा बोली.. कम से कम आज जो खीर बना लेती. क्यों सुरेश पैसे देकर नहीं गया क्या शिखा कुछ नहीं बोली जैसे कोई सांप सूंघ गया हो.. शिखा की सास एक करवट बदलकर आराम फरमाने में मशगूल हो गई.. शिखा उठी और गंदे कपड़ों को इकट्ठा करके ऊपर छत की ओर चली दी.... आज हवा में नमी थी इसलिए शिखा के हाथों में पसीने का अंश दिख रहा था... मन रह रह कर ना जाने किस  बात पर चिंतित था.।  पास में रखी थपकी, कपड़े धोने का, साबुन मग और बाल्टी में रखा गंदे हो चुके पानी वाला सर्फ इसी के इर्द-गिर्द शिखा अपने शब्दों को एक नई दिशा देने की कोशिश कर रही थी....... थपकी को जोर- जोर से मारने से छत पर गढ्ढे के निशान बन गए.... कपड़ों का पानी निचोड़ने के बाद शिखा एक-एक फटकारकर उन कपड़ों को सुखा रही थी.. मुन्ने के छोटे-छोटे कपड़ों को क्लिप के सहारे रस्सी से लटका दिया..हवा के सहारे कपड़े अपनी मनमौजी अंदाज में झूल रहे थे उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों वो सावन आने का इस्तकबाल कर रहे हो.......

शिखा ने जैसे ही अंगड़ाई को तोड़ा मानों उसका रोम रोम खिल उठा और सूखे हुए होठों पर एक फीकी हंसी सी आ गई..... कपड़े धोने के कारण हाथों की रेखाएं कुछ शर्मा सी गई थी..शिखा की छत के सामने कोई गंवार टाइप का लड़का आता हैं और उस पर अपना हक जमाने के लिए बेकार सी आवाज में गाना गा कर उसकी ओर घूरता हैं.. लेकिन वो उसकी तरफ बिल्कुल भी नहीं देखती और सीढ़ी से उतर कर नीचे की ओर चली जाती हैं. अपने जूड़े को ठीक करते हुए जैसे ही सोने के लिए तकिए को अपनी ओर खीचंती हैं कि जोर जोर से रोने की आवाजें आने लगती हैं. मुन्ना उठ गया हैं शिखा अपनी साड़ी को ठीक करते  मुन्ने की ओर करवट बदलती हैं मुन्ने को अपने सीने से लगाकर अपना दुध पिलाने लगती हैं..  .. कुछ ही देर बाद मुन्ने ने फिर से आंखे बंद कर ली जिससे कि उसकी मां आराम कर सके..... शिखा अब अपनी नींद को एक किसी सरकारी काम की तरह ठंडे बस्ते में डाल कर  काम में लग जाती हैं..  सूरज डूबने की ओर था.. शिखा की सास दोपहर की थकान को भूलकर होने वाली शाम को नमन करते हुए भैंस के चारे का इंतजाम करने के लिए तैयार हो रही थी............. भैंस आराम से अपनी पूंछ को उठाते हुए गोबर को साफ करने में लग हुई थी... इस बीच वो बराबूर जुगाली कर रही थी... झाडूं, सिल बाट के बिल्कुल नजदीक पड़ी हुआ थी.। शिखा ओ शिखा कहां मर गई... देख तेरा लल्ला उठ गया, मैं, आटा पिसवाने जा रही हूं.. बर्तन पड़े हुए हैं अच्छी तरह मांज दियो  शिखा की सास दरवाजे को भिड़काते हुए बोली...शिखा सब काम छोड़ते हुए मुन्ने को संभालने लगी.।  घड़ी ने ना जाने कब 6 बजा दिए मालूम ही नहीं पड़ा... मुन्ना आराम से दूध की बोतल के साथ सो गया। . पंखा अपनी तेजी के मताबिक नहीं चल रहा था।  हां, इतना था कि मक्खी उसके आस-पास भी नहीं थी.। 
शाम अपनी अंगड़ाईयों के साथ सोने को तैयार थी ..... मानो रात का स्वागत करने को तैयार हो खाट के सिराहने मुन्ना बिना कपड़े पहने खाली कटोरी के साथ खेल रहा था... शिखा कपड़ों को रस्सी से उतारकर खाट पर कुछ इस अंदाज में रख थी जैसे इनसे कोई वास्ता न हो........... क्लिप के सहारे लगे कुछ कपड़े अभी भी धीरे से चल रही हवा के झोके के साथ मुस्कराने पर आमदा थे... रात अपने पैर पसार चुका था.. घर के बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था....  शिखा की सास हुक्के को इस उम्मीद में सुलगा रही थी कि जैसे तैसे एक दो कश लगा सके... मुन्ना अचानक रोने लगा.. शिखा चूल्हे की राख को चिमटे के सहारे थोड़ा अंदर करके दौड़ी हुई आई,..... ना जाने क्या हो गया इसे सुबह से रोए जा रहा हैं.... इसका बाप भी अभी तक नहीं आया हुक्के के धुएं को आंगन में छोड़ती हुई शिखा की सास बोली. शिखा ने दूध की बोतल को मुन्ने के मुंह पर लगा दिया कितनी बार बोला हैं इस कलमुंही को कि अपना दूध पिला लेकिन मेरी कौन सुनता हैं आ गए हैं शहर से दो चार क्लास पढ़कर मुंह को बनाते हुए शिखा की सास बोली.. मां जी, मुझे थोड़ी कमजोरी महसूस हो रही हैं इसलिए मुन्ने को अपना दूध नहीं पिला सकती.. जबान तो देखो कैसे लबालब चलती हैं. चल घर में जा और मेरे लिए थोड़ा दूध गरम कर ला जी मां जी, अपने घूंघट को ठीक करते हुए शिखा बोली.  ऐसे लगा जैसे आज के जमाने में हिटलर आ गया हो..... शिखा की सास एक हल्की सी चादर को समटने लगी...आंगन के बाहर कोई उपले जला रहा था... सामने  वाले घर में लालटेन अपनी जिंदगी की अंतिम सांसे चल रही थी... शिखा की सास पंखे से हवा कर रही थी जो इस सिर्फ नाम की ही थी.. ..... जमीन पर खाट के पास रखा पानी का गिलास और साथ में रखी दवाई गुमसुम सी थी...... शिखा अभी अभी बर्तन साफ करके उठी थी.. घास काटने की मशीन के ऊपर रखी डिबिया मानों रात की खामोशी को समेटने की तैयारी में थी...मुन्ने को अपने वक्ष पर लिटाकर दिन भर की थकान को बिस्तर पर ओढने वाली ही थी कि .. कि दरवाजे पर आहट होती हैं.... खट खट शिखा मुन्ने को तकिए के सहारे लगा कर दरवाजे की ओर भागती हैं कुंडी को खोलते ही एक तेज आवाज आती हैं अब तक कहां थी साली तेरी मां की ...........  वो वो मैं . मुन्ने को सुला रही थी थोड़ा हकलाते हुए बोली ..  मुन्ने को सुला रही थी या अपने आशिक से बात कर रही थी... सुरेश लड़खड़ाते लड़खड़ते बोला आपने शराब पी हैं, क्या तू कौन होती हैं पूछने वाली  चल जा मेरे लिए कुछ खाने को ला बहुत भूख लगी हैं........ जी लाई ... खाना देखने  ही राजीव बोला अबे ये क्य़ा बनाया हैं जा जाकर अपनी मां को खिला ये दाल..... जी जी वो आपने पैसे नहीं दिए थे... तो घर में कुछ था नहीं तो मैंने दाल बना ली...... साली जुबान लड़ाती हैं.......... एक थप्पड़ शिखा के नाजुक गालों पर पड़ता हैं और आने वाले आंसू साड़ी के पल्लू में कही खो से जाते हैं...औऱ सासें कुछ धीमी पड़ जाती हैं............. सुरेश दारू पीकर सो जाता हैं। कुत्ते लगातार भौंक रहे हैं, डिबिया की लौ अब बुझ गई हैं। शिखा रोटी का एक टुकड़ा  खाने की कोशिश करती हैं लेकिन अपनी किस्मत के बारे में सोच कर ठहर जाती हैं., उधर मुन्ना उठ जाता हैं खाने को नहीं होने पर उसे उठाकर अपना दूध पिलाने लगती हैं। शिखा एक हाथ से पंखा और एक हाथ से मुन्ने को प्यार से थपकी देती रही.। इस दरम्यान ना जाने कब सुबह हो जाती हैं शिखा को मालूम नहीं होता.. और शिखा आधा घूघंट करके भैंसों की सानी करने लग जाती हैं. शिखा की सास हुक्के के सहारे कश लगा रही हैं।  शिखा का पति बड़े ही बेढंगे तरीके से सो रहा हैं....... मुंह पर लगातर मक्खी लग रही हैं... बाल ऐसे कि मानों सालों से ना नहाया हो बीड़ी पी पीकर अपने होंठ भी काले कर दिए। शिखा अपनी किताबें हिफाजत से रख रही हैं। शिखा का कल बीए का इम्तिहान हैं..

रवि कुमार छवि
भारतीय जनसंचार संस्थान
(नई दिल्ली पूर्व छात्र ) 


उलटफेर का विंबलडन

साल 2013 के तीसरे ग्रैंड स्लैम के प्रतिष्ठित विंबलडन में इस बार  टेनिस प्रेमियों को सकते में डाल दिया जिसकी वजह बना इस बार का उलटफेर..  इस विंबलडन को हमेशा याद रखा जाएगा इसलिए नहीं कि इसने वाहवाही लूटी बल्कि इसलिए कि इस बार दिग्गजों को मुंह की खानी पड़ी वो भी अपने से कई निचली रैंकिग के खिलाड़ियों से.
सबसे पहले बात करते हैं राफेल नडाल की. 12 बार के ग्रैंड स्लैम विजेता और लाल बजरी के बादशाह राफेल नडाल को एक अनजाने खिलाड़ी से हार का सामना करना पड़ा.. राफेल को बेल्जियम के 135वें नबंर के खिलाड़ी स्टीन डार्सिस ने हराकर सनसनी फैलाई जिसके कारण नडाल विंबडलन के पहले ही दौर से बाहर हो गए.. उलटफेर का सिलसिला सिर्फ यही थमा और जर्मनी की 23 वीं रैंकिग प्राप्त सबीन लिसिकी ने 16 बार की ग्रैंड स्लैम विजेता सेरेना विलियम्स को मात देकर विंबलडन में एक नया अध्याय लिख दिया.. ये विंबलडन में हुए अब तक के सबसे बड़े उलटफेर में से एक था.. लेकिन अब भी विंबलडन को अपने सबसे बड़े उलटफेर का इंतजार था. इस विंबलडन में अब तक सबसे बड़ा उलटफेर किया यूक्रेन के 116 वीं वरीयता प्राप्त सर्गेई कोवस्की ने. कोवस्की ने विबंडलन के विश्व रिकार्ड धारी रोडर फेडरर को हरा कर टेनिस इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज करवा लिया.. गौरतलब हैं कि रोडर फेडरर के नाम रिकार्ड 17 ग्रैंड स्लैम खिताब हैं. सिर्फ यही नहीं विबंडलन के ग्रास कोर्ट के उनके दबदबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता हैं कि उनके नाम सात विबंलडन खिताब भी हैं... वाकई, में ये एक नई शुरूआत थी जिसने इस खेल को और भी रोमांचक बना दिया.    इन खिलाड़ियों के अलावा लेटन हेविटमारिया शारापोवाअन्ना इवानोविच और सारा ईरानी ऐसे खिलाड़ी रहे जिन्हें इस बार खिताब से महरूम होना पड़ा.. दूसरी वजह बना खिलाड़ियों चोटिल होना. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट विंबलडन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सात खिलाड़ियों को चोट लगने के कारण प्रतियोगिता के दूसरे दौर से ही हटना पड़ा कई खिलाड़ियों ने माना था कि कोर्ट अच्छी स्थिति में नहीं था.. हालाकिं ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस एंड कॉर्केट क्लब ने एक बयान में कहा है, था कि  "कोर्ट की तैयारियों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. और जहाँ तक हमें जानकारी है ग्रास कोर्ट शानदार स्थिति में हैं. दरअसल ये पिछले साल के मुक़ाबले ज़्यादा सूखे हुए हैं." जो भी हो एक बात तो सामने आती हैं कि कहीं न कहीं कुछ तो कमी रही जिससे इस बार का यह विंबलडन सुर्खियों में रहा..
जाते-जाते इस विबंलडन को और भी यादगार बनाया ब्रिटेन के एंडी मरे ने जिन्होंने 77 सालों के सूखे को खत्म किया.. वे फ्रेड पेरी के बाद विबंलडन जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने.. पेरी ने 1936 में विंबलडन का पुरूष एकल का खिताब जीता था..  
कूड़ा घर  
जून की एक भरी दोपहर की गर्मी में वो कई सालों बाद साफ हो रहे नाले के पास इस इंतजार में  खड़ा हुआ था. कि नाले से कुछ सिक्के मिल जाए जिससे आज घर में चूल्हा जल सके।  तेज़ चल रहे ट्रैफिक से उसका कोई नाता नहीं था। वो तो बस किसी बड़ी क्रेन से उठकर और गिर रहे उन कूड़ें के ढेरों को देख रहा था.. बनियान और अपने पैरों के साइज से छोटी चप्पल फुल पेंट को काटकर बनाई गई हाफ पेंट पहने हुए राजू के हाथों में बड़ा सा कट्टा और बड़े से डंडे के नीचे लगी हुई छोटी सी चुंबक. वाली लकड़ी थी......... आखों में एक बनावटी सी हंसी मानों जिंदगी में कोई गम नहीं हैं......... सूरज की पड़ती चमक ने उसके बचपन की आजादी छीन ली हो. राजू के घर की माली हालत ने मानों उसके स्कूल जाने की इच्छाओं की निर्मम हत्या कर दी थी....... 
मैं रोज अक्सर आफिस जाते वक्त दोपहर को राजू को किसी नाले या किसी कूड़ें के ढेर के पास देखता था............. उससे देखकर लगता था कि वो किसी अजीब सी उधेड़बुन में लगा हुआ हैं.............  चेहरे पर लग  आ रही मक्खियों से बेपरवाह राजू खुद में कोई किरदार रचता रहता.......  कई बार सोचा कि उससे बातें करूं लेकिन समय मुझे इसकी इजाजत नहीं देता था।
लेकिन आज रविवार हैं तो सोचा कि राजू से मिला जाए. अपनी किताबें कम्प्यूटर के बराबर में रख कर मोबाइल को चार्जर से हटाकर घर से निकल जाता हूं इस उम्मीद में कि आज राजू से मुलाकात हो जाए .......... दरवाजे की कुंड़ी लगाकर जैसे ही मैंने अपनी गली में झाकं कर देखा.. तो सन्नाटा सा पसरा हुआ था..... एक अजीब तरह की उदासी सी छाई हुई थी........... खूंटे में बंधी हुई बकरी चिल्लाकर किसी को मदद के लिए पुकार रही थी. राजू के घर का ताला लगा हुआ था. मेरी उत्सुकता अब और भी बढ़ गई थी. कि इतनी सुबह  आखिर कहां गया..... मैं उसे ढूंढने के लिए निकल पड़ा।  गली के चौराहे पर खड़े हुए लड़कों के पास से मैं तेजी से निकल गया। ना जाने कहां चला गया ये लड़का अपने मोबाइल में टाइम देखते हुए मैंने अपने मन में सोचा। आखिर  मुझे एक सड़क के उस पार मिला। वो रोज़ की तरह एक कूड़े के ढेर के पास खड़ा हुआ था............ उन्हें देखकर राजू मन ही मन खुश हो रहा था...............  मैंने जैसे ही उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कुछ पूछा.. राजू ने अपनी गर्दन मेरी ओर धीरे से मोड़ी.  मैंने उससे पूछा कि क्या कर रहे हो तो इस पर राजू ने कहा देखता  हूं कि आज कितने पैसे मिलते हैं या क्या कोई कीमती चीज मिलती हैं, राजू ने अपने पसीने को गंदे हाथों से पोछते हुए कहा.. मैंने कहा क्यों,  पढ़ाई नहीं करनी क्या...... सर पढ़ाई तो करनी हैं थोड़ा हकलाते हुए राजू  बोला......  इतना कहकर राजू की आंखों में आंसू आ गए...... और निगाहें सामने ताले लगे स्कूल की ओर इशारा करने लगी....  मैंने उससे  पूछा कि क्या तुम भी स्कूल जाना चाहते हो...... जवाब में उसने हां में सिर हिलाया..... अब मेरी जिज्ञासा  और बढ़ गई थी..  इसलिए नहीं कि वो स्कूल जाना चाहता हैं बल्कि इसलिए कि  स्कूल जाने की बात कहते समय उसकी आंखों में एक आत्मविश्वास था. एक चमक थी.... ....... जो रह-रह-कर उसके आने वाले सुनहरे भविष्य की ओर इशारा कर रही थी...........  चूंकि मैं, इस शहर के मोबब्बत से अभी कोसों दूर था ......... तो मैंने राजू को ही किसी ऐसे स्थान पर चलने को कहां जहां राजू की गरीबी तो हो लेकिन उसका उपहास उड़ाने वाला कोई ना हो........
और फिर हम दोनों चल दिए एक ऐसी मंजिल की ओर जो राजू को इस दुनिया में उसको एक मुक्कमल पहचान दिला सके। नाले के पास पड़े हुए कूड़े को अब किसी और राजू की तलाश थी.......... अचानक जोर की बारिश शुरू होने लगी....................

 रवि कुमार छवि 

भारतीय जन संचार संस्थान , नई दिल्ली.. (न्यूज नेशन ) 

Tuesday, 25 June 2013



थूक का स्वाद 
आइए शर्मा जीकैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैंऔर ये बेवजहअपना गमछा क्यों ओढ़ के रखे हैं वो भी इतनी गर्मी में. थोड़े उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती हैं... और आलती पालथी मारकर बड़े इत्मीनान से बैठ जाते हैं. .बगल में पसीना आकर कुछ देर रूक सा सा जाता हैं . गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता हैं  जो कुछ समय बाद मुरारी बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं।  दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। छोटे बच्चे अपनी उम्र से पहले परिपक्कव होने की कोशिश करते दिखते हैं...... शर्मा जी एक खास किस्म का पान लेकर चल देते हैं ... जो किसी पुड़िया मे बंधी हुई थी। और उसे अपनी पेंट के  बाएं जेब में रखते हैं।   
शर्मा जी एक हाथ से छाता पकड़ें हुए 1990 के दशक के पुराने चश्मे को ठीक करते हुए आगे बढ़ जाते हैं   कुछ दूरी पर शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगते हैं. मानों जुगाली कर रहे हो। और देखते ही देखते अपने दफ्तर की ओर निकल जाते हैं। जितनी रफ्तार सड़क पर चल रही गाड़ियों की होती हैं उतनी ही धीमी गति से शर्मा जी पान के स्वाद लेते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता तब तक वो थूकते नहीं।
शर्मा जी उस पान को ऐसे खा रहे थे मानों कि वो पान इस दुनिया का आखिरी पान हो...... लगाता था कि शर्मा जी पान के माध्यम से अपने पैसे वसूल रहे थे। सिर्फ शार्मा जी ही नहीं अमूमन,पान खाने वाले लोगों की स्थिति कुछ ऐसे ही हैं........ कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं... पर क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। .. ना जाने क्यों शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं समझते । हमारे देश में कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे......  
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा खा रहा था.....  गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए। मुझे समझ नहीं आया कि वो महाशय आखिर क्यों उसे बड़े चाव से चबा रहे हैं खैर, इनमे से कुछ ऐसे लोग भी होते हैं . जो पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो........... कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की हैं शायद तभी वो लोग इस काम में इतने माहिर हैं....... और इतनी बेफ्रिकी से  कर रहे होते हैं ...... मगर एक बात तो हैं पान हो या गुटखा इनके थूक के स्वाद में शायद एक अजीब सा स्वाद हैं जो लोगों के मुंह को सान देता हैं.......
सोचता हूं कि क्यों न एक बार इसके स्वाद चखा जाए आखिर हम भी तो देखे कि इनके थूक का स्वाद कैसा होता हैं।


रवि कुमार छवि  

Saturday, 22 June 2013

कूड़ा घर  
जून की एक भरी दोपहर की गर्मी में वो कई सालों बाद साफ हो रहे नाले के पास इस इंतजार में  खड़ा हुआ था. कि नाले से कुछ सिक्के मिल जाए जिससे आज घर में चूल्हा जल सके।  तेज़ चल रहे ट्रैफिक से उसका कोई नाता नहीं था। वो तो बस किसी बड़ी क्रेन से उठकर और गिर रहे उन कूड़ें के ढेरों को देख रहा था.. बनियान और अपने पैरों के साइज से छोटी चप्पल फुल पेंट को काटकर बनाई गई हाफ पेंट पहने हुए राजू के हाथों में बड़ा सा कट्टा और बड़े से डंडे के नीचे लगी हुई छोटी सी चुंबक. वाली लकड़ी थी......... आखों में एक बनावटी सी हंसी मानों जिंदगी में कोई गम नहीं हैं......... सूरज की पड़ती चमक ने उसके बचपन की आजादी छीन ली हो. राजू के घर की माली हालत ने मानों उसके स्कूल जाने की इच्छाओं की निर्मम हत्या कर दी थी....... 
मैं रोज अक्सर आफिस जाते वक्त दोपहर को राजू को किसी नाले या किसी कूड़ें के ढेर के पास देखता था............. उससे देखकर लगता था कि वो किसी अजीब सी उधेड़बुन में लगा हुआ हैं.............  चेहरे पर लग  आ रही मक्खियों से बेपरवाह राजू खुद में कोई किरदार रचता रहता.......  कई बार सोचा कि उससे बातें करूं लेकिन समय मुझे इसकी इजाजत नहीं देता था।
लेकिन आज रविवार हैं तो सोचा कि राजू से मिला जाए. अपनी किताबें कम्प्यूटर के बराबर में रख कर मोबाइल को चार्जर से हटाकर घर से निकल जाता हूं इस उम्मीद में कि आज राजू से मुलाकात हो जाए .......... दरवाजे की कुंड़ी लगाकर जैसे ही मैंने अपनी गली में झाकं कर देखा.. तो सन्नाटा सा पसरा हुआ था..... एक अजीब तरह की उदासी सी छाई हुई थी........... खूंटे में बंधी हुई बकरी चिल्लाकर किसी को मदद के लिए पुकार रही थी. राजू के घर का ताला लगा हुआ था. मेरी उत्सुकता अब और भी बढ़ गई थी. कि इतनी सुबह  आखिर कहां गया..... मैं उसे ढूंढने के लिए निकल पड़ा।  गली के चौराहे पर खड़े हुए लड़कों के पास से मैं तेजी से निकल गया। ना जाने कहां चला गया ये लड़का अपने मोबाइल में टाइम देखते हुए मैंने अपने मन में सोचा। आखिर  मुझे एक सड़क के उस पार मिला। वो रोज़ की तरह एक कूड़े के ढेर के पास खड़ा हुआ था............ उन्हें देखकर राजू मन ही मन खुश हो रहा था...............  मैंने जैसे ही उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कुछ पूछा.. राजू ने अपनी गर्दन मेरी ओर धीरे से मोड़ी.  मैंने उससे पूछा कि क्या कर रहे हो तो इस पर राजू ने कहा देखता  हूं कि आज कितने पैसे मिलते हैं या क्या कोई कीमती चीज मिलती हैं, राजू ने अपने पसीने को गंदे हाथों से पोछते हुए कहा.. मैंने कहा क्यों,  पढ़ाई नहीं करनी क्या...... सर पढ़ाई तो करनी हैं थोड़ा हकलाते हुए राजू  बोला......  इतना कहकर राजू की आंखों में आंसू आ गए...... और निगाहें सामने ताले लगे स्कूल की ओर इशारा करने लगी....  मैंने उससे  पूछा कि क्या तुम भी स्कूल जाना चाहते हो...... जवाब में उसने हां में सिर हिलाया..... अब मेरी जिज्ञासा  और बढ़ गई थी..  इसलिए नहीं कि वो स्कूल जाना चाहता हैं बल्कि इसलिए कि  स्कूल जाने की बात कहते समय उसकी आंखों में एक आत्मविश्वास था. एक चमक थी.... ....... जो रह-रह-कर उसके आने वाले सुनहरे भविष्य की ओर इशारा कर रही थी...........  चूंकि मैं, इस शहर के मोबब्बत से अभी कोसों दूर था ......... तो मैंने राजू को ही किसी ऐसे स्थान पर चलने को कहां जहां राजू की गरीबी तो हो लेकिन उसका उपहास उड़ाने वाला कोई ना हो........
और फिर हम दोनों चल दिए एक ऐसी मंजिल की ओर जो राजू को इस दुनिया में उसको एक मुक्कमल पहचान दिला सके। नाले के पास पड़े हुए कूड़े को अब किसी और राजू की तलाश थी.......... अचानक जोर की बारिश शुरू होने लगी....................

 रवि कुमार छवि 

Saturday, 27 April 2013

थूक का स्वाद




थूक का स्वाद

आइए शर्मा जी, कैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैं, और ये बेवजह, अपना गमछा क्यों ओढ़ के रखे हो। वो भी इतनी गर्मी में।  थोड़े उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती हैं...गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का सिलसिला चलता हैं  जो कुछ समय बाद मुरारी बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं। दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। शर्मा जी एक खास किस्म का पान लेकर चल देते हैं ... जो  किसी पुड़िया मे बंधी हुई थी। उस पान की पुड़िया को अपनी पेंट के  बाएं जेब में रखते हैं   
शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगे मानों जुगाली कर रहे हो। और देखते ही देखते  अपने दफ्तर की ओर निकल जाते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता तब तक वो थूकते नहीं। कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं... पर क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। सिर्फ शर्मा जी ही नहीं वे जो लोग गुटखा. मसाला आदि खाते हैं....... उनकी हालत कमोबश ऐसी ही हैं. ....... ना जाने क्यों शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं समझते ।  
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा खा रहा था.....  गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए।  तो दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं.. जो कुछ पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो........... कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की हैं....... खैर, पान हो या गुटखा इनमें कुछ तो हैं इनके थूक के स्वाद में जो इन्हें बाहर नहीं फेंकने देता
सोचता हूं कि क्यों न एक बार खा कर देखा जाए आखिर हम भी तो देखे कि इनके थूक का  स्वाद कैसा होता हैं।

Wednesday, 28 March 2012

छोटे प्रारुप में चमकना छाएगाः भारत

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच होने वाला एकमात्र ट्वंटी  मैच 30 मार्च को जोहांनसबर्ग में खेला जाएगा। यह मैच भारतीयों के दक्षिण अफ्रीका में बसने के 150 वर्ष पूरे होने पर खेला जाएगा। इस मैच के लिए रोबिन उथप्पा को सचिन तेंदुलकर की जगह शामिल किया गया है जो पहले ही ट्वंटी मैच से सन्ंयास ले चुके हैं।
एकमात्र ट्वेंटी-20 मैच के लिए दक्षिण अफ्रीकी टीम की कमान जोहन बोथा संभालेंगे । जबकि न्यूजीलैंड के खिलाफ रिकार्ड छक्के जड़ने वाले रिचर्ड लेवी को भी  टीम में शामिल किया गया है। भारत का मेजबानों के खिलाफ रिकार्ड अच्छा रहा है।
 भारत ने अपना पहलाट्वंटी मैच अफ्रीकी टीम के खिलाफ खेला था जिसे भारत ने जीता था उस मैच में दिनेश कार्तिक को शानदार प्रदर्शन के लिए मैन आफ द मैच चुना गया था। इसके बाद 2009 में सुरेश रैना के शतक से भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हरा दिया था। ओर भारत हमेशा की तरह अपनी स्पिन गेंदबाजी  के भरोसे ही रहेगा। पिछले रिकार्ड को देखते हुए निश्चित रुप से भारत का पलड़ा ही भारी रहेगा। हालांकि मेहमानों को अपने घर में खेलने का फायदा मिलेगा। 

Monday, 26 March 2012

दमदार बांग्लादेश

भले ही बाग्ंलादेश एशिया कप का फाइनल मैच नहीं जीत पाई हो लेकिन उन्होंने  अपने शानदार खेल से न सिर्फ घरेलू क्रिकेट प्रेमियों  का बल्कि विश्व क्रिकेट प्रेमियों का दिल भी जीत लिया।
एशिया कप के शुरु होने से पहले बांग्लादेश को खिताब की दावेदारों  में भी शुमार नहीं किया जा रहा था। लेकिन उन्होंने अपनी जीवटता का बखूबी परिचय देते हुए पहले विश्व चैंपियन भारत और फिर चार बार की एशिया कप विजेता श्रीलंका को बाहर का रास्ता दिखाया। निश्चित रुप से ये जीत बाग्ंलादेश के क्रिकेट भविष्य के लिए संजीवनी काम करेगी।
भारत  पर मिली जीत को क्रिकेट पंडित महज एक तुक्का मान रहे थे लेकिन  उन्होंने जिस तरह से अगले मैच में श्रीलंका को हराया उसे देखकर कहीं से भी नहीं लगा कि वो एक नौसखिया टीम है। शुरुआत में ही बांग्लादेश ने पाकिस्तान को टक्कर देकर ये दिखा दिया कि इस टूर्नामेंट  में   उन्हें कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल होगी।
बहरहाल, पाकिस्तान ने अपना दूसरा एशिया कप  में  जीतकर दिखाया कि वो वाकई, में किसी भी दिन सर्वश्रेष्ठ होने पर अपने से भी ज्यादा मजबूत टीम को हराने की क्षमता रखते हैं। कहना गलत न होगा कि इस जीत से पाकिस्तान में क्रिकेट को बहाल करने  में  आसानी मिलेगी।
रवि
नई दिल्ली
8802076525

Friday, 23 March 2012

अशिष्टता के दरवाजे

अशिष्टता के दरवाजेराजधानी की सड़कों पर विभिन्न प्रकार के वाहन सरपट दौड़े देंखे जा सकते हैं जो  लोगों  को उनके उद्गम स्थान से गंतव्य स्थान तक पहुचाते हैं। मगर इन वाहनों  में डीटीसी की बस सेवा अपनी एक विशेष भूमिका निभाती है। यात्रा करने का काफी शौक है, खासकर बसों  में यात्राएं करना पड़े तो सोने पे सुहागा होता है। डीटीसी की बसों में यात्रा करने वालों  में सबसे अधिक संख्या मध्यवर्गीय परिवारों  की होती है।
अभी कुछ दिनों  पहले मुझे देश के सबसे बड़े बस अड्डे  कश्मीरी गेट से साकेत की बस लेनी थी। बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद साकेत जाने वाली बस मेरे चंद क़दमों  की दूरी पर आ रुकी थी। जैसे-तैसे भीड़ के भंवर से निकलकर काफी मशक्कत के बाद उस सीट पर जा बैठा जहां बैठने के लिए अन्य लोग धक्का -मुक्की पर आमदा थे। सीट मिलने से खुशी साफ तौर देखी जा सकती थी। अगर सीट नहीं मिलती तो पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ती। जिससे मेरी कपड़ों  की इस्त्री के खराब होने का डर था।
बस तेज गति से आगे बढ़ रही थीं और मैं दिल्ली की हरियाली का लुफ्त उठा रहा था इतने में पीछे से आवाज आई एक्सक्यूज मी एक टिकट देना ज्यों  हीं मैंने अपनी नजरें दौड़ाई तो पाया एक महिला कंडक्टर की सीट पर बैठी है। उसके हाथ में 5,10,20,50,100 के नोट देखकर सहज अनुमान लगा लिया की इस बस में कंडक्टर एक महिला है। इसके लिए मुझे अपने मानस पटल पर दृष्टि को टटोलने की जरुरत नहीं पड़ी। महिला कंडक्टर को देखकर हैरानी भी हुई जिसका कारण यह था कि राजधानी की बसों में अधिकांशतः पुरुष ही कंडक्टर होते हैं लेकिन उस बस में  महिला कंडक्टर थी यह मेरे लिए भी दोहरी खुशी थी पहले तो यह है  एक तो पुरुष कंडक्टर की हेकड़ी से कुछ निजात मिली। और दूसरी यह है कि अब वाकई में लगता है कि देश में महिलाओं  ने पुरुषों   के वर्चस्व को चुनौती देना शुरु कर दिया है।
मैं, बस की खिड़की वाली सीट पर बैठा था जहाँ  हवा तो आ रही थी लेकिन थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। महिला कंडक्टर लगातार टिकट काट कर यात्रियों  को दे रही थी। हालांकि वो एक कम उम्र की महिला थी लेकिन उसके टिकट देने से लग रहा था कि मानों  वह कोई पेशेवर कंडक्टर हो। यह देखकर काफी अच्छा लग रहा था कि महिलांए जो कभी समाज में अपने जीवनयापन के लिए  पुरुषों  पर निर्भर रहती थी। आज खुद आत्मनिर्भर होकर  पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है है। यह कहीं न कहीं समाज में  महिलाओं के प्रति बदलती हुई मानसिकता को दर्शाता है। यह सब सेच ही रहा था कि अगले ही पल बस झटके से रुकी स्टैंड से दो-चार लड़को का समुह देखा जो दिखने में अच्छे घर के लिए लग रहे थे। मगर, उनके आचरण से लगा कि मानों  वो लोग तहजीब की पहली कक्षा में हो चूंकि कंडक्टर एक महिला थी इसलिए लड़कों  के समूह ने कंडक्टर पर अपरोक्ष रुप से अश्लीली फब्तियां कसनी शुरु कर दी। ये देखने के बाद भी अनजान बनने की कोशिश करने लगा। महिला कंडक्टर थोड़ी सहज होने की केाशिश तो करती लेकिन, असहज होने के भाव उसके चेहरे वर साफ तौर पर देंखे जा सकते थे।
बस के आगे बढ़ने से उसमें भीड़ भी लगातार बढ़ रही थी। खिड़की से बाहर आने वाली हवा इतने लोगों  को देखकर बाहर चली जाती। ये सिलसिला यूं ही चल रहा था। मेरे मन में विचार निंरतर जन्म ले रहे थे अगर इस महिला के स्थान पर कोई पुरुष कंडक्टर होता तो क्या वाकई में लड़कों का समूह अपने संस्कारों  को भूल कर अशिष्टता के दरवाजे को लांघता। बस, अभी भी त्रीव गति से चल रही थी।
मैं, यात्रा के अंत तक यही सोचता रहा कि अगर महिलाएं इसी तरह समाज में अपनी छाप छोड़े तो पुरुष की वर्चस्वता वाले समाज को नकारा जा सकता है। यदि कहा जाए कि पुरुषों  की सत्ता को महिलाओं ने चुनौती देनी शुरु कर दी तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी। मेरे जेहन ये विचार अग्रसर हो ही रहे थे कि बस अचानक रुकी। भीड़ को कम होते देख समझ गया कि बस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गई है। महिला कंडक्टर बस को डिपो तक ले जाने में  ड्राइवर की सहायता कर रही थी। मै, अपने दफ्तर की मुड़ चुका था।

रवि

नई दिल्ली

8802076525