थूक का स्वाद
आइए शर्मा जी, कैसे हैं आप. मुरारी बाबू पान पर चूना लगाते-लगाते भले
मन से पूछ ही लेते हैं. ठीक हूं. आप कैसे हैं, और ये बेवजह, अपना गमछा क्यों ओढ़
के रखे हो। वो भी इतनी गर्मी में। थोड़े
उदास मन से शर्मा जी बोलते हैं। मुरारी बाबू की निकली हई तोंद कुछ अकड़ सी जाती
हैं...गली के नुक्कड़ पर एक छोटी सी गुमटीनुमा दुकान पर दोनों के बीच बातों का
सिलसिला चलता हैं जो कुछ समय बाद मुरारी
बाबू की बोनी होते ही खत्म हो जाता हैं। दुकान के बगल में साईकिल के स्टैंड पर साईकिलों
की भीड़ शुरू हो जाती हैं.। शर्मा जी एक खास किस्म का पान लेकर चल देते हैं ... जो
किसी पुड़िया मे बंधी हुई थी। उस पान की
पुड़िया को अपनी पेंट के बाएं जेब में
रखते हैं
शर्मा जी पान को मुंह में डाल कर उसे चारों ओर ठेलने लगे मानों जुगाली
कर रहे हो। और देखते ही देखते अपने दफ्तर की
ओर निकल जाते हैं। मुंह में घुल चुके पान की पीक को बाहर थूकने के बजाय अंदर ही
गटक लेते हैं। शायद उन्हें पान की पीक का स्वाद रास आने लगा था। जब पान का पूरी
तरह से शोषण हो चुका था और पान जब तक उनके मुंह के सहारे होठों को सान नहीं देता
तब तक वो थूकते नहीं। कई बार तो उन लोगों को देखकर ही उल्टी हो जाती हैं... पर
क्या करें दुनिया के साथ जो चलना हैं। सिर्फ शर्मा जी ही नहीं वे जो लोग गुटखा.
मसाला आदि खाते हैं....... उनकी हालत कमोबश ऐसी ही हैं. ....... ना जाने क्यों
शर्मा जी जैसे लोग उस थूक को भी अपने लिए किसी भी अमृत से कम नहीं
समझते ।
अभी कुछ दिनों पहले ही सड़क पर एक आदमी गुटखा
खा रहा था..... गुटखे से मुंह भरने पर भी महाशय
ने उसे थूका नहीं बल्कि निगल गए। तो दूसरी
ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं.. जो कुछ पान वगैराह को इस तरह से फेंकते हैं जैसे कि
उनके बीच प्रतियोगिता चल रही हो........... कभी-कभी लगता हैं कि सड़क उनके बाप की
हैं....... खैर, पान हो या गुटखा इनमें कुछ तो हैं इनके थूक के स्वाद में जो इन्हें
बाहर नहीं फेंकने देता
सोचता हूं कि क्यों न एक बार खा कर देखा जाए आखिर
हम भी तो देखे कि इनके थूक का स्वाद कैसा
होता हैं।