अशिष्टता के दरवाजेराजधानी की सड़कों पर विभिन्न प्रकार के वाहन सरपट दौड़े देंखे जा सकते हैं जो लोगों को उनके उद्गम स्थान से गंतव्य स्थान तक पहुचाते हैं। मगर इन वाहनों में डीटीसी की बस सेवा अपनी एक विशेष भूमिका निभाती है। यात्रा करने का काफी शौक है, खासकर बसों में यात्राएं करना पड़े तो सोने पे सुहागा होता है। डीटीसी की बसों में यात्रा करने वालों में सबसे अधिक संख्या मध्यवर्गीय परिवारों की होती है।
अभी कुछ दिनों पहले मुझे देश के सबसे बड़े बस अड्डे कश्मीरी गेट से साकेत की बस लेनी थी। बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद साकेत जाने वाली बस मेरे चंद क़दमों की दूरी पर आ रुकी थी। जैसे-तैसे भीड़ के भंवर से निकलकर काफी मशक्कत के बाद उस सीट पर जा बैठा जहां बैठने के लिए अन्य लोग धक्का -मुक्की पर आमदा थे। सीट मिलने से खुशी साफ तौर देखी जा सकती थी। अगर सीट नहीं मिलती तो पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ती। जिससे मेरी कपड़ों की इस्त्री के खराब होने का डर था।
बस तेज गति से आगे बढ़ रही थीं और मैं दिल्ली की हरियाली का लुफ्त उठा रहा था इतने में पीछे से आवाज आई एक्सक्यूज मी एक टिकट देना ज्यों हीं मैंने अपनी नजरें दौड़ाई तो पाया एक महिला कंडक्टर की सीट पर बैठी है। उसके हाथ में 5,10,20,50,100 के नोट देखकर सहज अनुमान लगा लिया की इस बस में कंडक्टर एक महिला है। इसके लिए मुझे अपने मानस पटल पर दृष्टि को टटोलने की जरुरत नहीं पड़ी। महिला कंडक्टर को देखकर हैरानी भी हुई जिसका कारण यह था कि राजधानी की बसों में अधिकांशतः पुरुष ही कंडक्टर होते हैं लेकिन उस बस में महिला कंडक्टर थी यह मेरे लिए भी दोहरी खुशी थी पहले तो यह है एक तो पुरुष कंडक्टर की हेकड़ी से कुछ निजात मिली। और दूसरी यह है कि अब वाकई में लगता है कि देश में महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देना शुरु कर दिया है।
मैं, बस की खिड़की वाली सीट पर बैठा था जहाँ हवा तो आ रही थी लेकिन थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। महिला कंडक्टर लगातार टिकट काट कर यात्रियों को दे रही थी। हालांकि वो एक कम उम्र की महिला थी लेकिन उसके टिकट देने से लग रहा था कि मानों वह कोई पेशेवर कंडक्टर हो। यह देखकर काफी अच्छा लग रहा था कि महिलांए जो कभी समाज में अपने जीवनयापन के लिए पुरुषों पर निर्भर रहती थी। आज खुद आत्मनिर्भर होकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है है। यह कहीं न कहीं समाज में महिलाओं के प्रति बदलती हुई मानसिकता को दर्शाता है। यह सब सेच ही रहा था कि अगले ही पल बस झटके से रुकी स्टैंड से दो-चार लड़को का समुह देखा जो दिखने में अच्छे घर के लिए लग रहे थे। मगर, उनके आचरण से लगा कि मानों वो लोग तहजीब की पहली कक्षा में हो चूंकि कंडक्टर एक महिला थी इसलिए लड़कों के समूह ने कंडक्टर पर अपरोक्ष रुप से अश्लीली फब्तियां कसनी शुरु कर दी। ये देखने के बाद भी अनजान बनने की कोशिश करने लगा। महिला कंडक्टर थोड़ी सहज होने की केाशिश तो करती लेकिन, असहज होने के भाव उसके चेहरे वर साफ तौर पर देंखे जा सकते थे।
बस के आगे बढ़ने से उसमें भीड़ भी लगातार बढ़ रही थी। खिड़की से बाहर आने वाली हवा इतने लोगों को देखकर बाहर चली जाती। ये सिलसिला यूं ही चल रहा था। मेरे मन में विचार निंरतर जन्म ले रहे थे अगर इस महिला के स्थान पर कोई पुरुष कंडक्टर होता तो क्या वाकई में लड़कों का समूह अपने संस्कारों को भूल कर अशिष्टता के दरवाजे को लांघता। बस, अभी भी त्रीव गति से चल रही थी।
मैं, यात्रा के अंत तक यही सोचता रहा कि अगर महिलाएं इसी तरह समाज में अपनी छाप छोड़े तो पुरुष की वर्चस्वता वाले समाज को नकारा जा सकता है। यदि कहा जाए कि पुरुषों की सत्ता को महिलाओं ने चुनौती देनी शुरु कर दी तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी। मेरे जेहन ये विचार अग्रसर हो ही रहे थे कि बस अचानक रुकी। भीड़ को कम होते देख समझ गया कि बस अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच गई है। महिला कंडक्टर बस को डिपो तक ले जाने में ड्राइवर की सहायता कर रही थी। मै, अपने दफ्तर की मुड़ चुका था।
रवि
नई दिल्ली
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