मुझे क्रिकेट के डाटा को कलेक्ट करने का बहुत शौक है! कभी कभी मुझे लगता है कि मैं क्रिकेट पर अच्छा लिख सकता हूँ और मेरा सपना है कि मैं क्रिकेट का एक बड़ा पत्रकार बनू !
Friday, 9 September 2011
Wednesday, 7 September 2011
झरोका कविता संख्या 129
मैं, जैसे ही सुबह उठा,
तो देखा की
दरवाजे के झरोके से
मुझे कोई देख रहा है
अगल बगल में किसी की मौजूदगी से
स्वत ही नजरिया बदल गया
खिली धूप और उपर से
ठंडी ठंडी हवा दरवाजे के झरोके से
चीख चीख कर पूछ रही थी
तू कौन है
जो अनायास ही मुझ जैसे फकीर को प्यार की
भीख दे रही है
वो खुद से बेखबर है
बस,
यादों में उसके मैं ही हूँ,
उसके इशारों से,
अपने छत पर घुमने का खौफ सताने लगा
वो भी मजबूर है
मैं भी मजबूर हूँ
शायद
यही हमारी मजबूरी है
देखने की लालसा तो मेरी भी है
लेकिन, क्या करू जब उसकी याद आती है
तो दरवाजे के उस झरोके को देख लेता हूँ.
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